Sunday, November 10, 2019

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भक्त व संत भक्त शेख फरीद जी (Bhagat Shek Farid  FacebookTwitterLinkedInPinterestWhatsApp देखु फरीद जु थीआ दाड़ी होई भूर ||  अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि || १ ||  शेख फरीद जिनका पूरा नाम फरीद मसऊद शकर गंज था| शेख फरीद जी का जन्म 1172 ई० में गाँव खोतवाल जिला मुल्तान में हुआ| इनके पिता का नाम शेख जमान सुलेमान तथा माता का नाम मरियम था| इनकी माता धर्मात्मा इस्लामी तालीम की ज्ञाता थी| वह शुद्ध ह्रदय वाली व ईमानदार थी| उसकी शिक्षा का प्रभाव फरीद जी के ऊपर बचपन में ही बहुत पड़ा| आप १२ साल से पहले ही कुरान मजीद अध्यन्न कर गए| यह भी कहा जाता है कि मौखिक रूप से पहले ही याद कर लिया तथा धार्मिक परिपक्व हो गए| इनके पिता मशहूर सूफी थे| शेख फरीद जी के पूर्वज सुल्तान महमूद गजनवी के साथ संबंध रखते थे| आप के पिता गजनवी के भतीजे थे| सुलेमान पहले हिंद आ गया, फिर वहाँ से लाहौर आ बैठा| सुलेमान का फकीरी दायरा कायम हों गया| लाहौर से उठ कर जंगली इलाके मुलक की तरफ चले गए| अनत में पाकपटन में अपना स्थान कायम कर लिया| वहीं शेख फरीद जी का जन्म हुआ| शेख फरीद जी का जन्म गुरु नानक देव जी से पहले पाँच सौ साल पहले माना जाता है| एक दिन माता ने तपस्या के बारे में बताया तो आप ने विचार बना लिया कि युवा होकर तपस्या करेंगे| जब युवा हुए, चेतना आयी तो घर से तपस्या के लिए निकल पड़े| उन्होंने बारह साल जंगल में काटे| उनके बाल बढ़ गए व जुड़ गए| प्रभु का सिमरन करते हुए गर्मी-सर्दी में रहकर वन की पीलू, करीरो के डेले, थोहर का पक्का फल आदि खा लेते| कभी-कभी वृक्ष के पत्ते भी खा लेते| उनके मन में बारह साल भक्ति करके अहंकार आ गया| उन्होंने चिडियों को कहा “मर जाओ”| सचमुच ही चिडिया मर गई| “जीवित हो जाओ” वह सचमुच ही जीवित हो गई| उन्हें लगा कि उनकी भक्ति पूरी हो गई है| रिद्धिया-सिद्धिया मिल गई हैं| अच्छा हो गया है| अहंकार में भरे हुए फरीद जी पास के गाँव में पहुंच गए| अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएँ की तरफ चल दिए| वहाँ पर एक स्त्री पानी का डोल निकालती व भरकर उल्टा देती| फरीद जी ने कहा कन्या! मुझे पानी पिलाओ मैं दूर से आया हूँ| परन्तु उस कन्या ने फरीद जी की तरफ ध्यान न दिया और अपने कार्य में लगी रही| फरीद जी क्रोधित हो गए और कहने लगे – “मैं कब से कह रहा हूँ मुझे पानी पिलाओ| जमीन पर पानी फैंकने से तुम्हें क्या लाभ?” कन्या ने उत्तर दिया मेरी बहन का घर जल रहा है, आग बुझा रही हूँ| मेरी बहन का घर यहाँ से बीस कोस दूर है| फरीद जी यह सुनकर बहुत हैरान हुए| कन्या ने कहना शुरू किया कि यहाँ चिड़िया नहीं जिनको कहोगे “मर जाओ” तो वह मर जाएँगी तथा कहोगे “उड़ जाओ” तो उड़ जाएँगी| यहाँ यह नहीं| यह बात सुनकर फरीद जी दंग रह गए कि उसे यह बात कहाँ से ज्ञात हुई| आप चाहे मुझे पानी न पिलाए परन्तु यह सारी शक्ति जानने तथ आग बुझाने  की कहाँ से प्रप्त की? कन्या ने उत्तर दिया “सेवा तथा पति प्रेम करती हूँ| यही तपस्या है अहंकार नहीं|” भला आपने तो परीक्षा की, प्रभु की परीक्षा मन में संदेह उत्पन किया| ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था| फरीद जी ने पानी पिया और क्या देखते हैं कि कुआँ खाली है, न डोल, न फिरनी, न वह स्त्री| अकेले फरीद जी वहाँ खड़े थे| वह हैरान हो गए और जान गए कि परमात्मा ने यह सारा खेल रचा है| घर पहुँचे तो माँ ने देखा कि पुत्र के बाल जुड़े हुए हैं| वह उसे सवारने लगी| फरीद जी को पीड़ा महसूस हुई| माँ कहने लगी पुत्र! जिन वृक्षों के पत्ते तोडकर खाते थे तो उनको पीड़ा नहीं होती थी? इस तरह दूसरों को दुःख देने से पीड़ा अनुभव होती है| सबमे अल्लाह का नूर है चाहे कोई पक्षी है या परिंदा| उन्हें ज्ञात हो गया कि उनकी भक्ति अभी अधूरी है| जो की थी चिड़ियों की परीक्षा में गवा ली| इस तरह उनके मन में दूसरी बार तपस्या करने का ध्यान आया| बाबा फरीद ने फिर घर छोड़ दिया| धरती पर गिरी हुई चीज़ ही खाते, वृक्ष से पत्ता तक न तोड़ते| इस तरह कई साल बीत गए| उनका शरीर कमजोर हो गया| प्रभु दर्शन की लालसा थी| पर भगवान के दर्शन नहीं होते थे| उस समय की शारीरिक व मानसिक अवस्था को फरीद जी ने इस तरह बयान किया है – कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु ||  ऐ दुई नैना मति छुहउ पिर देखन की आस || १९ || भव- शरीर पिंजर मात्र ही रह गया है| इस तरह कई साल भक्ति करते बीत गए परमेश्वर नहीं आया| प्रभु के दर्शन एक दो बार हुए| मन को संतुष्ठी हुई पर पूर्णता प्राप्त नहीं हुई| उन्हें यह ज्ञात हो गया कि बिना मुरशद धारण किए मन को संतोष प्राप्त नहीं हो सकता| इसलिए गुरु धरण करना जरुरी है| गुरु की ख़ोज में फरीद जी अजमेर में चिश्ती साहिब के पास पहुँच गए| उन्हें मुरशद मानकर सेवा करने लगे| भक्ति के लिए सेवा व श्रद्धा दो गुण चाहिए थे| आप डटकर सेवा करते रहे| आपकी सेवा गुरु को स्नान कराने की थी| स्वयं ही अग्नि जलानी और पानी गर्म करना| एक दिन खूब बारिश हुई| उस काल में माचिस न होने के कारण अग्नि संभालकर रखनी पड़ती थी| फरीद जी को चिंता हो गई| उसी भयंकर तूफान में डेरे से बाहर निकल पड़े और उन्होंने देखा कि वेश्या की बैठक में अग्नि जल रही है| फरीद जी निडरता के साथ अन्दर चले गए| उन्हें देखकर वेश्या मन ही मन कुछ ओर ही सोचती रही लेकिन उसका सोचना फरीद जी के विपरीत था| उन्होंने कहा माता जी! अग्नि चाहिए| यदि अग्नि न मिली तो स्नान कैसे होगा और चिश्ती जी खुदा की बंदगी कैसे करेंगे| यह सुनकर कुकर्मी वेश्या हँस पड़ी और कहने लगी कि मुझे भी किसी चीज़ की आवश्कता है| फरीद जी – किस चीज़ की आवश्कता है? वेश्या – आपकी| मुझे आपकी आँखे बहुत प्यारी लगी हैं| अगर आप मुझे अपनी आँख की पुतली देंगे तो अग्नि अवश्य ही मिल जायेगी| इतिहास में लिखा है – जैसे ही वेश्या ने तेज चाकू लिया और आँख पर लगाया उसे अचानक धक्का लगा और पीछे गिर गई| लेकिन फरीद की आँख पर घाव हो गया| उसने आँख पर पट्टी बाँध दी और फरीद जी तो अग्नि देकर फरीद जी से क्षमा माँगने लगी| अपने नियम के अनुसार फरीद जी ने प्रातकाल अग्नि जलाई, पानी गर्म किया और गुरु जी को स्नान कराया| गुरु जी ने पूछा फरीद आँख पर पट्टी क्यों बांध रखी है? फरीद जी हाथ जोड़ कर खड़े रहे| “पट्टी खोल दो” गुरु जी ने हुक्म किया| जैसे की पट्टी खोली आँख पर कोई घाव नहीं था| आँख वैसे की वैसी थी| मुरशद ने वचन किया, तुम्हारी सेवा परवान हुई, तपस्या भी पूर्ण हुई| अहंकार मत करना| नम्रता अपनाना और खुदा को सदा याद रखना| रिद्धियां – सिद्धियां सदा आपके साथ रहेंगी| अपने घर जाकर खुदा की महिमा गाओ| इस प्रकार हजरत चिश्ती साहिब प्रसन्नता पूर्वक वर देते गए और बाबा फरीद जी उनके चरण पकड़कर श्रवण करते हुए कृतार्थ हो गए| बाबा फरीद जी अपने घर पाक पटन लौट आए और इस्लाम धर्म का प्रचार करने लगे| नेकी, सत्य और विनय का प्रकाश चारों तरफ जगमगा गया तथा आपकी गद्दी का यश दूर – दूर तक फ़ैल गया| जो भी उस गद्दी पर विराजमान होता उसका नाम फरीद रखा जाता| अब भी यह गद्दी करामाती गद्दी मानी जाती है| साहितिक देन: श्री गुरुग्रंथ साहिब में आप की बाणी के सलोक विद्यमान हैं जिन्हें “सलोक फरीद जी” कहा जाता है| इनकी सारी ही बाणी कल्याणकारी तथा उपदेश प्रदान करने वाली है| FacebookTwitterLinkedInPinterestWhatsApp   Read more https://spiritualworld.co.in/bhakto-aur-santo-ki-jivni-aur-bani-words-by-great-bhagats/bhagat-shek-farid-ji-an-introduction/

भक्त व संत

भक्त शेख फरीद जी (Bhagat Shek Farid

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देखु फरीद जु थीआ दाड़ी होई भूर || 
अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि || १ || 

शेख फरीद जिनका पूरा नाम फरीद मसऊद शकर गंज था| शेख फरीद जी का जन्म 1172 ई० में गाँव खोतवाल जिला मुल्तान में हुआ| इनके पिता का नाम शेख जमान सुलेमान तथा माता का नाम मरियम था| इनकी माता धर्मात्मा इस्लामी तालीम की ज्ञाता थी| वह शुद्ध ह्रदय वाली व ईमानदार थी| उसकी शिक्षा का प्रभाव फरीद जी के ऊपर बचपन में ही बहुत पड़ा| आप १२ साल से पहले ही कुरान मजीद अध्यन्न कर गए| यह भी कहा जाता है कि मौखिक रूप से पहले ही याद कर लिया तथा धार्मिक परिपक्व हो गए| इनके पिता मशहूर सूफी थे|

शेख फरीद जी के पूर्वज सुल्तान महमूद गजनवी के साथ संबंध रखते थे| आप के पिता गजनवी के भतीजे थे| सुलेमान पहले हिंद आ गया, फिर वहाँ से लाहौर आ बैठा| सुलेमान का फकीरी दायरा कायम हों गया| लाहौर से उठ कर जंगली इलाके मुलक की तरफ चले गए| अनत में पाकपटन में अपना स्थान कायम कर लिया| वहीं शेख फरीद जी का जन्म हुआ|

शेख फरीद जी का जन्म गुरु नानक देव जी से पहले पाँच सौ साल पहले माना जाता है| एक दिन माता ने तपस्या के बारे में बताया तो आप ने विचार बना लिया कि युवा होकर तपस्या करेंगे| जब युवा हुए, चेतना आयी तो घर से तपस्या के लिए निकल पड़े|

उन्होंने बारह साल जंगल में काटे| उनके बाल बढ़ गए व जुड़ गए| प्रभु का सिमरन करते हुए गर्मी-सर्दी में रहकर वन की पीलू, करीरो के डेले, थोहर का पक्का फल आदि खा लेते| कभी-कभी वृक्ष के पत्ते भी खा लेते| उनके मन में बारह साल भक्ति करके अहंकार आ गया| उन्होंने चिडियों को कहा “मर जाओ”| सचमुच ही चिडिया मर गई| “जीवित हो जाओ” वह सचमुच ही जीवित हो गई| उन्हें लगा कि उनकी भक्ति पूरी हो गई है| रिद्धिया-सिद्धिया मिल गई हैं| अच्छा हो गया है|

अहंकार में भरे हुए फरीद जी पास के गाँव में पहुंच गए| अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएँ की तरफ चल दिए| वहाँ पर एक स्त्री पानी का डोल निकालती व भरकर उल्टा देती| फरीद जी ने कहा कन्या! मुझे पानी पिलाओ मैं दूर से आया हूँ|

परन्तु उस कन्या ने फरीद जी की तरफ ध्यान न दिया और अपने कार्य में लगी रही| फरीद जी क्रोधित हो गए और कहने लगे – “मैं कब से कह रहा हूँ मुझे पानी पिलाओ| जमीन पर पानी फैंकने से तुम्हें क्या लाभ?”

कन्या ने उत्तर दिया मेरी बहन का घर जल रहा है, आग बुझा रही हूँ| मेरी बहन का घर यहाँ से बीस कोस दूर है| फरीद जी यह सुनकर बहुत हैरान हुए| कन्या ने कहना शुरू किया कि यहाँ चिड़िया नहीं जिनको कहोगे “मर जाओ” तो वह मर जाएँगी तथा कहोगे “उड़ जाओ” तो उड़ जाएँगी| यहाँ यह नहीं|

यह बात सुनकर फरीद जी दंग रह गए कि उसे यह बात कहाँ से ज्ञात हुई| आप चाहे मुझे पानी न पिलाए परन्तु यह सारी शक्ति जानने तथ आग बुझाने  की कहाँ से प्रप्त की?

कन्या ने उत्तर दिया “सेवा तथा पति प्रेम करती हूँ| यही तपस्या है अहंकार नहीं|” भला आपने तो परीक्षा की, प्रभु की परीक्षा मन में संदेह उत्पन किया| ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था| फरीद जी ने पानी पिया और क्या देखते हैं कि कुआँ खाली है, न डोल, न फिरनी, न वह स्त्री| अकेले फरीद जी वहाँ खड़े थे| वह हैरान हो गए और जान गए कि परमात्मा ने यह सारा खेल रचा है|

घर पहुँचे तो माँ ने देखा कि पुत्र के बाल जुड़े हुए हैं| वह उसे सवारने लगी| फरीद जी को पीड़ा महसूस हुई| माँ कहने लगी पुत्र! जिन वृक्षों के पत्ते तोडकर खाते थे तो उनको पीड़ा नहीं होती थी? इस तरह दूसरों को दुःख देने से पीड़ा अनुभव होती है| सबमे अल्लाह का नूर है चाहे कोई पक्षी है या परिंदा| उन्हें ज्ञात हो गया कि उनकी भक्ति अभी अधूरी है| जो की थी चिड़ियों की परीक्षा में गवा ली| इस तरह उनके मन में दूसरी बार तपस्या करने का ध्यान आया|

बाबा फरीद ने फिर घर छोड़ दिया| धरती पर गिरी हुई चीज़ ही खाते, वृक्ष से पत्ता तक न तोड़ते| इस तरह कई साल बीत गए| उनका शरीर कमजोर हो गया| प्रभु दर्शन की लालसा थी| पर भगवान के दर्शन नहीं होते थे| उस समय की शारीरिक व मानसिक अवस्था को फरीद जी ने इस तरह बयान किया है –

कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु || 

ऐ दुई नैना मति छुहउ पिर देखन की आस || १९ ||

भव- शरीर पिंजर मात्र ही रह गया है| इस तरह कई साल भक्ति करते बीत गए परमेश्वर नहीं आया| प्रभु के दर्शन एक दो बार हुए| मन को संतुष्ठी हुई पर पूर्णता प्राप्त नहीं हुई| उन्हें यह ज्ञात हो गया कि बिना मुरशद धारण किए मन को संतोष प्राप्त नहीं हो सकता| इसलिए गुरु धरण करना जरुरी है|

गुरु की ख़ोज में फरीद जी अजमेर में चिश्ती साहिब के पास पहुँच गए| उन्हें मुरशद मानकर सेवा करने लगे| भक्ति के लिए सेवा व श्रद्धा दो गुण चाहिए थे| आप डटकर सेवा करते रहे| आपकी सेवा गुरु को स्नान कराने की थी| स्वयं ही अग्नि जलानी और पानी गर्म करना| एक दिन खूब बारिश हुई| उस काल में माचिस न होने के कारण अग्नि संभालकर रखनी पड़ती थी| फरीद जी को चिंता हो गई| उसी भयंकर तूफान में डेरे से बाहर निकल पड़े और उन्होंने देखा कि वेश्या की बैठक में अग्नि जल रही है| फरीद जी निडरता के साथ अन्दर चले गए| उन्हें देखकर वेश्या मन ही मन कुछ ओर ही सोचती रही लेकिन उसका सोचना फरीद जी के विपरीत था| उन्होंने कहा माता जी! अग्नि चाहिए| यदि अग्नि न मिली तो स्नान कैसे होगा और चिश्ती जी खुदा की बंदगी कैसे करेंगे|

यह सुनकर कुकर्मी वेश्या हँस पड़ी और कहने लगी कि मुझे भी किसी चीज़ की आवश्कता है|

फरीद जी – किस चीज़ की आवश्कता है?

वेश्या – आपकी| मुझे आपकी आँखे बहुत प्यारी लगी हैं| अगर आप मुझे अपनी आँख की पुतली देंगे तो अग्नि अवश्य ही मिल जायेगी|

इतिहास में लिखा है – जैसे ही वेश्या ने तेज चाकू लिया और आँख पर लगाया उसे अचानक धक्का लगा और पीछे गिर गई| लेकिन फरीद की आँख पर घाव हो गया| उसने आँख पर पट्टी बाँध दी और फरीद जी तो अग्नि देकर फरीद जी से क्षमा माँगने लगी|

अपने नियम के अनुसार फरीद जी ने प्रातकाल अग्नि जलाई, पानी गर्म किया और गुरु जी को स्नान कराया| गुरु जी ने पूछा फरीद आँख पर पट्टी क्यों बांध रखी है? फरीद जी हाथ जोड़ कर खड़े रहे| “पट्टी खोल दो” गुरु जी ने हुक्म किया| जैसे की पट्टी खोली आँख पर कोई घाव नहीं था| आँख वैसे की वैसी थी| मुरशद ने वचन किया, तुम्हारी सेवा परवान हुई, तपस्या भी पूर्ण हुई| अहंकार मत करना| नम्रता अपनाना और खुदा को सदा याद रखना| रिद्धियां – सिद्धियां सदा आपके साथ रहेंगी| अपने घर जाकर खुदा की महिमा गाओ|

इस प्रकार हजरत चिश्ती साहिब प्रसन्नता पूर्वक वर देते गए और बाबा फरीद जी उनके चरण पकड़कर श्रवण करते हुए कृतार्थ हो गए|

बाबा फरीद जी अपने घर पाक पटन लौट आए और इस्लाम धर्म का प्रचार करने लगे| नेकी, सत्य और विनय का प्रकाश चारों तरफ जगमगा गया तथा आपकी गद्दी का यश दूर – दूर तक फ़ैल गया| जो भी उस गद्दी पर विराजमान होता उसका नाम फरीद रखा जाता| अब भी यह गद्दी करामाती गद्दी मानी जाती है|




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                                             गरीब साहिब जी  सम्पूर्ण जीवन परिचय 



संत गरीबदास जी महाराज

आदरणीय गरीबदास साहेब जी का आर्विभाव सन् 1717 में हुआ तथा साहेब कबीर जी के दर्शन दस वर्ष की आयु में सन् 1727 में नला नामक खेत में हुए तथा सत्लोक वास सन् 1778 में हुआ। आदरणीय गरीबदास साहेब जी को भी परमात्मा कबीर साहेब जी सशरीर जिंदा रूप में मिले। आदरणीय गरीबदास साहेब जी अपने नला नामक खेतों में अन्य साथी ग्वालों के साथ गाय चरा रहे थे। जो खेत कबलाना गाँव की सीमा से सटा है। ग्वालों ने जिन्दा महात्मा के रूप में प्रकट कबीर परमेश्वर से आग्रह किया कि आप खाना नहीं खाते हो तो दूध ग्रहण करो क्योंकि परमात्मा ने कहा था कि मैं अपने सतलोक गाँव से खाना खाकर आया हूँ। 


तब परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि मैं कुँआरी गाय का दूध पीता हूँ। बालक गरीबदास जी ने एक कुँआरी गाय को परमेश्वर कबीर जी के पास लाकर कहा कि बाबा जी यह बिना ब्याई (कुँआरी) गाय कैसे दूध दे सकती है ? तब (कबीर जी ने कुँआरी गाय अर्थात् बच्छिया की कमर पर हाथ रखा, अपने आप कुँआरी गाय (अध्नया धेनु) के थनों से दूध निकलने लगा। पात्र भरने पर रूक गया। वह दूध परमेश्वर कबीर जी ने पीया तथा प्रसाद रूप में कुछ अपने बच्चे गरीबदास जी को पिलाया तथा सतलोक के दर्शन कराये। सतलोक में अपने दो रूप दिखाकर फिर जिंदा वाले रूप में कुल मालिक रूप में सिंहासन पर विराजमान हो गए तथा कहा कि मैं ही 120 वर्ष तक काशी में धाणक (जुलाहा) रूप में रहकर आया हूँ। पवित्र वेदों में जो कविर अग्नि, कविर्देव (कविरंघारिः) आदि नाम हैं वह मेरा ही बोध है। ‘कबीर बेद हमारा भेद है, मैं मिलु बेदों से नांही। जौन बेद से मैं मिलूं, वो बेद जानते नांही।।‘ मैं ही वेदों से पहले भी सतलोक में विराजमान था।

(गाँव छुड़ानी जि. झज्जर (हरियाणा) में आज भी उस जंगल में जहाँ पूर्ण परमात्मा, का सन्त गरीबदास जी को मानव शरीर में साक्षात्कार हुआ था, एक यादगार विद्यमान है।) आदरणीय गरीबदास जी की आत्मा अपने परमात्मा कबीर बन्दी छोड़ के साथ चले जाने के बाद उन्हें मृत जान कर चिता पर रख कर जलाने की तैयारी करने लगे, उसी समय आदरणीय गरीबदास साहेब जी की आत्मा को पूर्ण परमेश्वर ने शरीर में प्रवेश कर दिया। दस वर्षीय बालक गरीब दास जीवित हो गए। उसके बाद उस पूर्ण परमात्मा का आँखों देखा विवरण अपनी अमृत वाणी में ‘‘सद्ग्रन्थ‘‘ नाम से ग्रन्थ की रचना की। उसी अमृत वाणी में प्रमाण:

अजब नगर में ले गया, हमकूं सतगुरु आन। झिलके बिम्ब अगाध गति, सूते चादर तान।।
अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड का एक रति नहीं भार। सतगुरु पुरुष कबीर हैं कुल के सृजन हार।।
गैबी ख्याल विशाल सतगुरु, अचल दिगम्बर थीर है। भक्ति हेत काया धर आये, अविगत सत् कबीर हैं।।
हरदम खोज हनोज हाजर, त्रिवैणी के तीर हैं। दास गरीब तबीब सतगुरु, बन्दी छोड़ कबीर हैं।।
हम सुल्तानी नानक तारे, दादू कूं उपदेश दिया। जात जुलाहा भेद नहीं पाया, काशी माहे कबीर हुआ।।
सब पदवी के मूल हैं, सकल सिद्धि हैं तीर। दास गरीब सतपुरुष भजो, अविगत कला कबीर।।
जिंदा जोगी जगत् गुरु, मालिक मुरशद पीर। दहूँ दीन झगड़ा मंड्या, पाया नहीं शरीर।।
गरीब जिस कूं कहते कबीर जुलाहा । सब गति पूर्ण अगम अगाहा।।

उपरोक्त वाणी में आदरणीय गरीबदास साहेब जी महाराज ने स्पष्ट कर दिया कि काशी वाले धाणक (जुलाहे) ने मुझे भी नाम दान देकर पार किया, यही काशी वाला धाणक ही (सतपुरुष) पूर्ण ब्रह्म है।

कबीर ही सतलोक से जिन्दा महात्मा के रूप में आकर मुझे अजब नगर (अद्धभुत नगर सतलोक) में लेकर गए। जहाँ पर आनन्द ही आनन्द है, कोई चिन्ता नहीं, जन्म-मृत्यु, अन्य प्राणियों के शरीर में कष्ट आदि का शोक नहीं है।

इसी काशी में धाणक रूप में आए सतपुरुष ने भिन्न-भिन्न समय में प्रकट होकर आदरणीय श्री अब्राहीम सुल्तान अधम साहेब जी तथा आदरणीय दादू साहेब जी व आदरणीय नानक साहेब जी को भी सतनाम देकर पार किया। वही कविर्देव जिसके एक रोम कूप में करोड़ो सूर्यों जैसा प्रकाश है तथा मानव सदृश है, अति तेजोमय अपने वास्तविक शरीर के ऊपर हल्के तेजपुंज का चोला (भद्रा वस्त्र अर्थात् तेजपुंज का शरीर) डाल कर हमें मृत्य लोक (मनुष्य लोक) में मिलता है। क्योंकि उस परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप के प्रकाश को चर्म दृष्टि सहन नहीं कर सकती।

आदरणीय गरीबदास साहेब जी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है ‘सर्व कला सतगुरु साहेब की, हरि आए हरियाणे नुँ‘‘। सन् 1966 को पंजाब प्रान्त के विभाजन होने पर इस क्षेत्र का नाम हरिआणा (हरयाणा) पड़ा। लगभग 236 वर्ष पूर्व कही वाणी 1966 में सिद्ध हुई कि समय आने पर यह क्षेत्र हरयाणा प्रान्त नाम से विख्यात होगा। जो आज प्रत्यक्ष प्रमाण है।


 

Thursday, October 3, 2019

Wani garib sahib ji

Wani garib sahib ji
पंख होत परबस पर्यो, सूवा के बुधि नाहिं।
अकिल बिहूना आदमी, यों बन्धा जग माहिं।। 3 ।।

बुद्धिहीन ‘सुवा पक्षी' पंखों के होते हुए भी अज्ञानवश दूसरों के बंधन में पड़ जाता है। इसी प्रकार बुद्धिहीन मूर्ख मनुष्य मोह-माया की अज्ञानता में फंसकर इस संसार के बंधन में पड़ा हुआ है, अर्थात सब कुछ कहते-सुनते हुए भी मोह के बंधन से मुक्त नहीं हो पाता है।
सत साहेब जी : -  SAT KABIR
अकिल बिहूना आंधरा, गज फन्दे पडो आय।
ऐसे सब लग बंधिया, काहि कहूं समझाय।। 5।।

ज्ञान-बुद्धि के बिना प्रत्येक प्राणी आंख रहते हुए भी अंधे के समान है। बुद्धिहीन मदमस्त हाथी अपार शक्तिशाली होते हुए भी जाल में फंस जाता है। इसी प्रकार इस जग का प्रत्येक जीव अपने-अपने अभिमान से बंधा हुआ है। किस-किस को समझाऊं, अर्थात विवेक बिना जहां देखो, यही हाल है।
सत साहेब जी : -  SAT KABIR
माया सम नहिं मोहिनी, मन समान नहिं चोर।
हरिजन सम नहिं पारखी, कोई न दीसे ओर।।3।।

इस संसार में माया के समान कोई मोहने वाला नहीं है और मन के समान कोई चोर नहीं है। सद्गुरु के प्रियवर ज्ञान-उपदेशी तथा भक्ति-साधना करने वाले सेवक जनों के समान कोई पारखी (ज्ञानी) नहीं। इस प्रकार का ऐसा कोई और नहीं दिखाई देता।
सत साहेब जी : -  SAT KABIR
माया सेती मति मिली, जो सोबरिया देहि।
नारद से मुनिवर गले, क्याहि भरोसा तेहि।। 10 ।।

इस माया-मोह से सावधान रहो। इससे मत मिलो, चाहे यह कितनी भी सुंदर व स्वर्णिम देह वाली ही क्यों न हो। इसके चक्कर में पड़कर तो देवर्षि नारद जैसे श्रेष्ठ मुनि भी गल गए। फिर विचार करो कि तुम्हारा क्या होगा? अर्थात माया के संग-प्रभाव से बच पाना अति कठिन है।
सत साहेब जी : -  SAT KABIR