Saturday, September 28, 2019

परमात्मा का का सहज मार्ग

परमात्मा का का सहज मार्ग


                                                           परमात्मा का का सहज मार्ग 






सुन्न के परे पुरुष को धामा ? तहँ साहब है आदि अनामा 
ताहि धाम सब जीव का दाता  मैं सबसों कहता निज बाता ?
रहत अगोचर सब के पारा  आदि अनादि पुरुष है न्यारा 
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला  ताके संग नहीं कोई चेला 
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तेरा साहब है घर माँहीं ? बाहर नैना क्यों खोलै 
कहै कबीर सुनो भई साधो  साहब मिल गए तिल ओलै ?
है तिल के तिल के तिल भीतर ? बिरले साधु पाया है 
चतुदल कमल त्रिकुटी राजे  ॐकार दर्शाया है ?
ररंकार पद श्वेत सुन्न मध्य ? षट दल कवल बताया है 
पारब्रह्म महासुन्न मझारा  जहां नि:अक्षर रहाया है ?
भंवर गुफा में सौंह राजे ? मुरली अधिक बजाया हैं 
सतलोक सतपुरुष विराजे  अलख अगम दोउ भाया है 
पुरुष अनामी सब पर स्वामी  ब्रह्मण्ड पार जो गाया है 
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ये सब बातें काया माहीं ? प्रतिबिम्ब अण्ड का पाया है ?
ताकि नकल देख माया ने  काया माहि दिखाया है ?
ये सब काल जाल का फंदा  सकल जीव उरझाया है 
कहे कबीर सतलोक सार है  सतगुरु न्यारा कर दिखलाया है ?
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नोट - ध्यान की कृमवद्ध स्थिति जानने हेतु सुन्न 1 से सुन्न 7 तक प्रष्ठ पक्तियों को नीचे से ऊपर की ओर पढें 
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अष्ट प्रमान = भौंह से 8 अंगुल ऊपरअंड = मन
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अकह लोक - अनामी पुरुष - शुद्ध ब्रह्म ( ब्रह्मांड के पार) (अब वह उसमें समा गयी  जो बेअन्त है)
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सुन्न 7, अगम लोक - अगम पुरुष  - महाकाल  हंसो का अदभुत स्वरूप  
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सुन्न 6, अलख लोक - अलख पुरुष - निर्गुण काल  विस्तार असंख्य महापालिंग  अरब खरब सूर्यों का प्रकाश
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सुन्न 5, सत्यलोक - सतपुरुष - निरंजन + माया (पहली कला)
एक ‘पद्मपालिंग’ का विस्तार  3 लोक का ‘1 पालिंग’  वीणा’ की आवाज  अमृत का भोजन 
इन सब दृश्यों को देखती हुयी सुरति ‘सतलोक’ पहुँची  और ‘सतपुरुष’ का दर्शन पाया 
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इस मैदान के आगे पहुँची  तो उसे ‘सतलोक’ की सीमा दिखाई दी  वहाँ पर ‘तत्सत’ की आवाज भी सुनाई देती है  अनेक नहरें और सुन्दर दृश्य  करोङ योजन ऊँचाई वाले वृक्षों के बाग  उन वृक्षों पर करोङों सूर्य चन्द्रमा और अनेकानेक फ़ल फ़ूल 
सुन्न 4, निर्वाण पद - सतगुरु - सोऽहं पद
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आसमानी झूला की सैर के बाद सुरति और आगे की तरफ़ चली  तो दूर से चन्दन की
अति मनमोहक खुशबू अनन्त सुगन्ध उसे महसूस हुयी  इस स्थान पर ‘बाँसुरी’ की अनन्त धुन भी हो रही है 
(2 पर्वतों की संधि - भंवर गुफ़ा) (गुरु दरबार) (चेतन सहस अठासी दीपदयाल देश नामक निजधाम का पहला लोक  अगोचरी मुद्रा/शुकदेव
यहाँ चक्र (झूलाहै  सुरति झूलती है  दीपों से ‘सोऽहंग’ की आवाज उठ रही है 
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महासुन्न का मैदान - - सुरति और आगे चली तो ‘महासुन्न का मैदान’ आया  इस जगह पर 4 शब्द और 4 (5) अति गुप्त स्थान - बन्दीवान पुरुष !
(परन्तु फ़िर भी उसके हाथ कुछ  लगा  तब वह फ़िर और ऊपर को चङी  और जो चिह्न ? सदगुरुदेव ने बताया था  उसकी सीध लेकर सुरति उस मार्ग पर चली 
फ़िर लगभग खरब योजन का सफ़र तय करके सुरति नीचे उतरी 
(यहाँ 10 योजन तक घना काला घोर अंधकार है  इस अत्यन्त तिमिर अंधकार को गहराई से वर्णित करना बेहद कठिन है विषम घाटी
अब ‘महासुन्न’ का नाका तोङकर वह आगे बङी 
सुरति चलते चलते 5 अरब 75 करोङ योजन और ऊपर की ओर चली गयी 
------- सुन्न 3 के 2 भाग हैं  (यहाँ तक 5 ब्रह्म, 5 अंड)------------ 
सुन्न 3 का पहला भाग
ब्रह्म 5 - महासुन्न - (7वीं सुन्नमहाकाल की कला - (अचिंतपारब्रह्म (सहज) - निःअच्छर 
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(महासुन्न - में 7 लोक आते हैं  जहां कोई तत्व नहीं है  लेकिन शून्यमहाशून्य़ दोनों महाप्रलय के अधीन हैं)
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सुन्न 3 का दूसरा भाग
ब्रह्म 4 - (6वीं सुन्ननिर्गुण काल की कला (10वां द्वारसेत (श्वेतसुन्न (मानसरोवर)-अच्छर ब्रह्म-ररंकार-हंस  निर्मल चैतन्य देश (यादयाल देश का द्वार  खेचरी मुद्रा/ब्रह्माविष्णुमहेश 
त्रिकुटी स्थान से 12 गुणा अधिक प्रकाश  बहुत सी अप्सराओं द्वारा स्थान स्थान पर नृत्य  स्वादिष्ट सूक्ष्म भोजन  अनेको तरह के राग रंग नाना खेल  झरने  हीरे के चबूतरेपन्ने की क्यारियाँजवाहरात के वृक्ष  अनन्त शीशमहल  स्थूल तथा जङता नहीं है  सर्वत्र चेतन ही चेतन है 
लगभग करोङ योजन ऊपर चङकर तीसरा परदा तोङकर वह ‘सुन्न’ में पहुँची 
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त्रिकुटी महल (अलग सेब्रह्म सरोवर में स्नानमनवाणीशरीर से परे  सत शिष्य 
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ब्रह्म 3 -ॐकार (4 दल कमल) (त्रिकुटी देश मेंमनबुद्धिचित्तअहं (सुरतिकी गति यहाँ तक
लगभग लाख योजन लम्बा और चौङा  अनेक तरह के विचित्र तमाशे और लीलाएं  हजारों सूर्य चन्द्रमा से अधिक प्रकाश  हमेशा  और बादल की गरज  भूचरी मुद्रा/व्यास
इस बंकनाल से पार होकर सुरति ‘दूसरे आकाश’ पहुँची  यहाँ ‘त्रिकुटी स्थान’ है 
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बंकनाल - इसके आगे ‘बंकनाल’ याने टेङा मार्ग है 
(जो कुछ दूर तक सीधा जाकर नीचे की ओर आता है  फ़िर ऊपर की ओर चला जाता है )
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(अनहद शब्द अजपा जाप से घट में प्रकट होता है  सबसे पहले यह शब्द ‘दिल’ में सुनाई देता है 
निरंतर अभ्यास करने से ‘दाहिनी आँख’ के ऊपर भवों के पास सुनाई देता है)
इसके ऊपर यानी यहाँ से ‘ब्रह्माण्ड देश’ की सीमा शुरु होती है  यहाँ से 2 आवाजें आसमानी निकलती हैं  अर्थात यहीं से ‘शब्द’ प्रकट होता है 
इस प्रकाश के ऊपर एक ‘बारीक और झीना दरबाजा’ है 
(अभ्यासी को चाहिये कि इस छिद्र में से सुरति को ऊपर प्रविष्ट करे)
ब्रह्म 2 (सहस्रार-हजार दल कमलकरतार (निरंजन) 3 लोक का मालिक  यहाँ का प्रकाश देखकर सुरति त्रप्त हो जाती है  स्वांसो की गिनती 21600  बृह्माण्ड देश का पहला लोक 
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तब आकाश दिखाई देगा  जिसमें ‘सहस्त्रदल’ कमल दिखाई देगा 
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जब आँख भीतर बिलकुल उलट जायेगी  तब सुरति शरीर में ऊपर की ओर चङेगी 
इसके बाद आसमान पर तारों जैसी चमकदीपमाला जैसी झिलमिलचाँद जैसा प्रकाशसूर्य जैसी किरणें दिखाई देंगी 
(इससे वृति अभ्यास में लीन होने लगती है )
- 5 तत्वों के रंग लालपीलानीलाहरासफ़ेद दिखते हैं 
बिजली जैसी चमक और दीपक जैसी ज्योति दिखाई देती है 
तो सबसे पहले अन्धकार में प्रकाश की कुछ किरणें दिखायी देती हैं  फ़िर अलोप हो जाती हैं 
जब समाधि द्वारा आँखों की दोनों पुतलियाँ अन्दर की और उलटने लगती है 
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--------------- यहाँ से नीचे - पिंड (भौंहों से नीचे)--------------
सुन्न 2, निरंजन + माया - की दूसरी कला - पुरुष + प्रकृति (शुद्ध सगुण कालज्योति निरंजन
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आज्ञाचक्र - स्वांस 1000 
ब्रह्म 1 (मनआँखों के पीछे (2 दल कंज कमल - बगभौंराचाचरी मुद्रा/गोरखनाथ
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सुन्न 1 (कंठअविद्यामायाअष्टांगी > ने उत्पन्न किये > ब्रह्माविष्णुशंकर > सावित्रीलक्ष्मीगौरी  (विराट और सागर बनाया)
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(सुन्न - में 14 लोक (निम्नआते हैं  जहां तत्व हैं)
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7वां आकाशकंठ (विशुद्ध) (16 दल कमलशरिंग (श्रींध्वनि  स्वांस 1000 
 ब्रह्मा विष्णु को समाधिअष्टांगी ने पुत्र पुत्रियों का आपस में विवाह कर दिया 
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6वां आकाशह्रदय (अनाहत) (12 दल कमलसोऽहं ध्वनि   शंकरगौरी - गण - कैलाश पर्वत  स्वांस 6000  रंग - सफ़ेद 
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5वां आकाशनाभि (मणिपूर) (8 दल कमलहिरिंग (ह्रींध्वनि  विष्णुलक्ष्मी - भक्त - बैकुंठ  स्वांस 6000  रंग - नीला 
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4था आकाशस्वाधिष्ठान (इन्द्रियचक्र) (6 दल कमलॐकार ध्वनि  ब्रह्मासावित्री - संसार रचना  स्वांस गिनती 6000  रंग - सुनहला 
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3सरा आकाशधर्मराज - स्वर्गनर्क - अदल पसारा (कर्म और फ़ल का)
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2सरा आकाशमूलाधार (4 दल कमलकलिंग (क्लींध्वनि  गणेशइन्द्र - देवता , मुनि - रंभा का सदा नृत्य  रंग-लाल  स्वांस गिनती 1600
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1हला आकाशमृत्युलोक - जन्म मरण - माया के धोखे में फ़ंसा जीव !
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यहाँ तक - 14 तबक (खंड या लोकतल)
इसके नीचे - 7 तबक और (कुल 21 सुन्न)
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(पाताल)
पाताल - शेषनाग
रसातल - धौल
महातल - (वाराहसुअर
तलातल - (मीनमच्छ
सुतल - कच्छ
वितल - कूर्म (कछुआ
अतल - कूर्म
(यहाँ का - जलरंगपुरुष है)
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कर नैनों दीदार  पिंड से न्यारा है 
तू हिरदे सोच विचार  यह अंड मंझारा है
चोरी जारी निन्दा चारों  मिथ्या तज सतगुरु सिर धारो 
सतसंग कर सत नाम उचारो  तब सनमुख लहो दीदारा है 
जे जन ऐसी करी कमाई  तिनकी फैली जग रोसनाई 
अष्ट प्रमान जगह सुख पाई ? तिन देखा अंड मंझारा है ?
सोई अंड को अवगत राई  अमर कोट अकह नकल बनाई  
सुद्ध ब्रह्म पर तहं ठहराई  सो नाम अनामी धारा है      
सतवीं सुन्न अंड के माहीं  झिलमिलहट की नकल बनाई  7
महाकाल तहं आन रहाई  सो अगम पुरुष उच्चारा है 
छठवीं सुन्न जो अंड मंझारा  अगम महल की नकल सुधारा  6
निरगुन काल तहां पग धारा  सो अलख पुरुष कहु न्यारा है 
पंचम सुन्न जो अंड के माहीं  सत्तलोक की नकल बनाई  5
माया सहित निरंजन राई  सो सत्त पुरुष दीदारा है 
चौथी सुन्न अंड के माहीं  पद निर्बान की नकल बनाई  4
अविगत कला ह्वै सतगुरु आई  सो सोऽहं पद सारा है 
तीजी सुन्न की सुनो बड़ाई  एक सुन्न के दोय बनाई  3
ऊपर महासुन्न अधिकाई  नीचे सुन्न पसारा है 
सतवीं सुन्न महाकाल रहाई  तासु कला महासुन्न समाई 
पारब्रह्म कर थाप्यो ताही  सो निःअच्छर सारा है 
छठवीं सुन्न जो निरगुन राई  तासु कला  सुन्न समाई 
अच्छर ब्रह्म कहैं पुनि ताही  सोई सब्द ररंकारा है 
पंचम सुन्न निरंजन आई  तासु कला दूजी सुन छाई  2
पुरुष प्रकिरती पदवी पाई  सुद्ध सरगुन रचन पसारा है 
पुरुष प्रकति दूजी सुन माहीं  तासु कला पिरथम सुन आई 
जोत निरंजन नाम धराई  सरगुन स्थूल पसारा है 
पिरथम सुन्न जो जोत रहाई  ताकी कला अबिद्या बाई  1
पुत्रन संग पुत्री उपजाई  यह सिंध बैराट पसारा है 
सतवें अकास उतर पुनि आई  ब्रह्मा बिस्नु समाध जगाई  7
पुत्रन संग पुत्री परनाई  यहं स्रिंग नाम उचारा है 
छठे अकास सिव अवगति भौंरा  जंग गौर रिधि करती चौरा  6
गिरि कैलाश गन करते सोरा  तहं सोहं सिर मौरा है 
पंचम अकास में बिस्नु बिराजे  लछमी सहित सिंघासन गाजे  5
हिरिंग बैकुंठ भक्त समाजे  जिन भक्तन कारज सारा है 
चौथे अकास ब्रह्मा बिस्तारा  सावित्री संग करत बिहारा  4
ब्रह्म ऋद्धि ओंग पद सारा  यह जग सिरजनहारा है 
तीजे अकास रहे धर्म राई  नर्क सुर्ग जिन लीन्ह बनाई   3
करमन फल जीवन भुगताई  ऐसा अदल पसारा है 
दूजे अकास में इन्द्र रहाई  देव मुनी बासा तहं पाइ  2
रंभा करती निरत सदाई  कलिंग सब्द उच्चारा है 
प्रथम अकास मृत्तु है लोका  मरन जनम का नित जहं धोखा  1
सो हंसा पहुंचे सत लोका  जिन सत्तगुरु नाम उचारा है 
चौदह तबक किया निरवारा  अब नीचे का सुनो बिचारा  14
सात तबक में छः रखबारा  भिन भिन सुनो पसारा है  7
सेस धौल बाराह कहाई  मीन कच्छ और कुरम रहाई 
सो छः रहे सात के माहीं  यह पाताल पसारा है 
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संतो अचरज एक भौ भारी  कहौं तो को पतियाई 
एकै पुरुष एक है नारी ? ताकर करहु विचारा 
एकै अंड सकल चौरासी ? भरम भुला संसारा 
एकै नारी जाल पसारा ? जग में भया अंदेशा 
खोजत खोजत काहु अंत  पाया  ब्रह्मा विष्णु महेशा 
नाग फांस लिये घट भीतर ? मूसेनि सब जग झारी 
ग्यान खडग बिनु सब जग जूझे ? पकरि  काहू पाई 
आपै मूल फूल फुलवारी  आपुहि चुनि चुनि खाई ?
कहहिं कबीर तेई जन उबरे  जेहि गुरू लियो जगाई 


सत  साहिब जी 




Thursday, September 26, 2019

सत कबीर पूर्ण सतगुरु : सत साहिब

सत कबीर पूर्ण सतगुरु : सत साहिब:   पळापछी के कारने, सब जग रहा भुलान। निर्पक्ष होय के हरि भजै, सोई संत सुजान॥ बडे गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार। सतगरु के परचै ...

Wednesday, September 25, 2019

सत साहिब






 

पळापछी के कारने, सब जग रहा भुलान। निर्पक्ष होय के हरि भजै, सोई संत सुजान॥
बडे गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार। सतगरु के परचै बिना, चारों बरन चमार।।
माया तजे क्या भया, जो मान तजा नहिं जाय। जेहि माने मुनिवर ठगे, सो मान सबन को खाय।।
माया के झक जग जरे, कनक कामिनी लाग। कहहिं कबीर कस बांचिहो, रुई लपेटी आग॥
माया जग सांपिनि भई, विष ले पैठि पताल। सब जग फन्दे फन्दिया, चले कबीरू काछ॥
सांप बिच्छू का मंत्र है, माहुरहू झारा जाय। विकट नारि के पाले परे, काढ़ि कलेजा खाय।।
तामस केरे तीन गुण, भंवर लेइ तहां बास। एकै डारी तीन फल, भांटा ऊख कपास।।
मन मतंग गइयर हने, मनसा भई सचान। जंत्र-मंत्र माने नहीं, लागी उड़ि-उड़ि खान।।
मन गयंद माने नहीं, चले सुरति के साथ। महावत बिचारा क्या करे, जो अंकुश नाहीं हाथ।।
ई माया है चूहड़ी, औ चूहड़ों की जोय। बाप पूत अरुझाय के, संग न काहु के होय॥
कनक कामिनी देखि के, तू मत भूल सुरंग। मिलन बिछुरन दुहेलरा, जस केंचुलि तजत भुवंग॥
माया केरी बसि परे, ब्रह्मा-विष्णु महेश। नारद शारद सनक सनन्दन, गौरी पूत गणेश॥
पीपरि एक जो महागंभानि,ताकर मर्म कोइ नहिं जानि। डारलबायफल कोइ न पाय, खसम अछत बहुपीपरे जाय॥

संखों रिद्धि सिद्धि लैने हारे, औह पद बिरले अर्थ विचारे।। राज करें भवसागर कीरा, जिन कूँ मिलैं न मुरशद पीरा। सत्यसुकृत हृदय में आवै, कोटि राज का तिलक धरावै।। अनभय पाठ पढ़े जो हंसा, धन्य धन्य जिन के हैं कुलबंसा। अष्ट कँवल दल नाम अधारा, धन्य धन्य जिनका है परिवारा।। जिन जान्या साहिब निज धर्मा, सो पौंहचेंगे निज पद घरमा। उस समर्थ का शरणा लैरे, चौदह भुवन कोटि जय जय रे।। संख रंग रंगी के साजै, जिस घर अजब घड़ावलि बाजै। सोहं मंत्र कल्प किदारा, अमर कछ होय पिंड तुम्हारा।। ॐ आदि अनादिं लीला, या मंत्र में अजब करीला। सोहं सुरति लगै सहनांना, टूटे चौदह लोक बंधाना।। राम नाम जपि कर थिर होई, ऊँसोहं मंत्र दोई। बुद्धि विवेक से पावै मूलं, तातें मिट है संसा सूलं ।।

दम सुदम का करै विचारा, सोहं सुरति झड़े घनसारा।। गरीब, सोहं सुरति सुभान है, जे कोई लावै तार। पल में पारिंग होत है, अलमीना दीदार।। ८० सहंस इकीसौं छै सौ जानें, कुंभक रेचक उलटा तानें इला पिंगला सुष्मण सारं, देखो दम दम में दीदारं। च्यार मुक्ति की करै न आशा, कोटि कोटि वैकुण्ठ विलासा। अजरा बीज जरै पात मांहीं सिंध अताज हंस पसाहीं।

रामदेव जी की वाणी

रामदेव जी की वाणी





आदि महापमा सचिया धर्म आद रा मेला, मकर तणा पंथ पछे हुआ ॥
असंग जुगां पहले आरम रचिया, ओमकार से रणुकार हुया ।
मुख में उठ मम्माई बोली भंवर गुफा भणकार भया ।
शक्ति ने एक पंथ उपाया, अभी तणा कुंवारा भया ।
इण्ड फोड़ ब्रह्माण्डरचाया धरा आमर दाता जोड़ लिया ।
जागत बैठत सोवत नहिं लागे, कोन पुरुष का नेम लिया ।
हाथां री हथेली रा दाता वचन पालिया, ब्रह्मा विष्णु महेश भया ।
पांच सन्त मिल कांकण बांधिया, सही भजन रा नेम लिया ।
अलख निरन्जन घट में बैठा, पहली नेम महादेव लिया ।
लिंग भंग दो गोती कहाया, सतबादी साधू साध रिया ।
भंग से भंगवा तुरत उपाया, पहली भेक भगवान लिया ।
आद मंडाण मूल से मांडिया, काना सुणे ज्यांरा पाप झड़े ।
मछंदर प्रताण जति गौरख बोले एक मन ध्यावे ज्यांरा काज सरे ।




Wednesday, September 18, 2019

साहिब कबीर दर्शन


                                                                    साहिब कबीर दर्शन



ऐसा राम कबीर ने जाना। धर्मदास सुनियो दै काना।।
सुन्न के परे पुरुष को धामा। तहँ साहब है आदि अनामा।।
ताहि धाम सब जीवका दाता। मैं सबसों कहता निज बाता।।
रहत अगोचर (अव्यक्त)सब के पारा। आदि अनादि पुरुष है न्यारा।।
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला। ताके संग नहीं कोई चेला।।
ताहि न जाने यह संसारा। बिना नाम है जमके चारा।।
नाम बिना यह जग अरुझाना। नाम गहे सौ संतसुजाना।।
सच्चा साहेब भजु रे भाई। यहि जगसे तुम कहो चिताई।।
धोखा में जिव जन्म गँवाई। झूठी लगन लगाये भाई।।
ऐसा जग से कहु समझाई। धर्मदास जिव बोधो जाई।।
सज्जन जिव आवै तुम पासा। जिन्हें देवैं सतलोकहि बासा।
भ्रम गये वे भव जलमाहीं। आदि नाम को जानत नाहीं।।
पीतर पाथर पूजन लागे। आदि नाम घट ही से त्यागे।।
तीरथ बर्त करे संसारे। नेम धर्म असनान सकारे।।
भेष बनाय विभूति रमाये। घर घर भिक्षा मांगन आये।।
जग जीवन को दीक्षा देही। सत्तनाम बिन पुरुषहि द्रोही।।
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै। आपन भूला जगत भूलावै।।
ऐसा ज्ञान चलाया भाई। सत साहबकी सुध बिसराई।।
यह दुनियां दो रंगी भाई। जिव गह शरण असुर (काल) की जाई।।
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई। यह जम जाल तहाँ ठहराई।।
यहै जगत ऐसा अरुझाई। नाम बिना बूड़ी दुनियाई।।
जो कोई भक्त हमारा होई। जात वरण को त्यागै सोई।।
तीरथ व्रत सब देय बहाई। सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई।।
मनहीं बांध स्थिर जो करही। सो हंसा भवसागर तरही।।
भक्त होय सतगुरुका पूरा। रहै पुरुष के नित्त हजूरा।।
यही जो रीति साधकी भाई। सार युक्ति मैं कहूँ गुहराई।।
सतनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय।
दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहिं पाय।।
गहै नाम सेवा करै, सतनाम गुण गावै।
सतगुरु पद विश्वास दृढ़, सहज परम पद पावै।।
ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई। धर्मदास तोहि कथा सुनाई।।
यही जगत की उलटी रीती, नाम न जाने कालसों प्रीती।।
वेद रीति सुनयो धर्मदासा। मैं सब भाख कहों तुम पासा।।
वेद पुराण में नामहि भाषा। वेद लिखा जानो तुम साखा।।
चीन्हों है सो दूसर होई। भर्म विवाद करें सब कोई।।
मूल नाम न काहू पाये। साखा पत्रा गह जग लपटाये।।
डार शाख को जो हृदय धरहीं। निश्चय जाय नरकमें परहीं।।
भूले लोग कहे हम पावा। मूल वस्तू बिन जन्म गमावा।।
जीव अभागि मूल नहिं जाने। डार शाख को पुरुष बखाने।।
पढ़े पुराण और वेद बखाने। सतपुरुष जग भेद न जाने।।
वेद पढ़े और भेद न जाने। नाहक यह जग झगड़ा ठाने।।
वेद पुराण यह करे पुकारा। सबही से इक पुरुष नियारा।
तत्वदृष्टा को खोजो भाई, पूर्ण मोक्ष ताहि तैं पाई।

साहिब गरीब जी वाणी

साहिब गरीब जी वाणी




मन तू चल रे सुख के सागर जहाँ  शब्द  सिन्धु  रत्नागर ।
कोटि जन्म तोहे भ्रमत हो गए  कुछ ना हाथ लगा रे ।
कुकर  शुकर  खर  भया बौरे   कवुआ हंस  बुगा रे ।
कोटि जन्म तू राजा किन्हा मिटी न मन की आशा ।
भिक्षुक होकर दर-2 हांडया मिला न निर्गुण राशा ।
इन्द्र कुबेर  इश की  पदवी ब्रह्म वरूण  धर्मराया ।
विष्णु नाथ के  पुर को  जाकर  फेर  अपूठा  आया ।
असंख्य जन्म तोहे मर तयाँ होगे जीवित क्यों ना मरै रे ।
द्वादश मध्य महल मठ बौरे   बहुर  ना  देह धरै रे ।
दोजख  भीस्त  सभी   तैं देखे राज  पाठ के रसिया ।
तीन लोक से  तृप्त नाहीं   यह  मन  भोगी  खसिया ।
सतगुरु मिले तो इच्छा मेटे   पद मिल  पदे समाना ।
चल हंसा उस लोक पठाऊँजो आदि अमर अस्थाना ।
चार मुक्ति  जहाँ चम्पि करती  माया हो रही  दासी ।
दास गरीब  अभय पद  परसै  मिले राम  अविनाशी । 




वाणी श्री गरीब साहिब जी

वाणी  श्री गरीब साहिब जी 







बिन ही मुख सारंग राग सुनबिन ही तंती तार। 
बिना सुर अलगोजे बजैंनगर नांच घुमार।।
घण्टा बाजै ताल नगमंजीरे डफ झांझ। 
मूरली मधूर सुहावनीनिसबासर और सांझ।।
बीन बिहंगम बाजहिंतरक तम्बूरे तीर। 
राग खण्ड नहीं होत हैबंध्या रहत समीर।।
तरक नहीं तोरा नहींनांही कशीस कबाब। 
अमृत प्याले मध पीवैंज्यों भाटी चवैं शराब।।
मतवाले मस्तानपुरगली-गुलजार। 
संख शराबी फिरत हैंचलो तास बजार।।
संख-संख पत्नी नाचैंगावैं शब्द सुभान। 
चंद्र बदन सूरजमुखीनांही मान गुमान।।
संख हिंडोले नूर नगझूलैं संत हजूर। 
तख्त धनी के पास करऐसा मुलक जहूर।।
नदी नाव नाले बगैंछूटैं फुहारे सुन्न। 
भरे होद सरवर सदानहीं पाप नहीं पुण्य।।
ना कोई भिक्षुक दान देना कोई हार व्यवहार। 
ना कोई जन्मे मरेऐसा देश हमार।।
जहां संखों लहर मेहर की उपजैंकहर जहां नहीं कोई। 
दासगरीब अचल अविनाशीसुख का सागर सोई।।

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गरीबचौरासी बंधन कटेकीनी कलप कबीर। 
भवन चतुरदश लोक सबटूटे जम जंजीर।।
गरीबअनंत कोटि ब्रांड मेंबंदी छोड़ कहाय। 
सो तौ एक कबीर हैंजननी जन्या न माय।।
गरीब
शब्द स्वरूप साहिब धनीशब्द सिंध सब माँहि। 
बाहर भीतर रमि रह्याजहाँ तहां सब ठांहि।।
गरीब
जल थल पृथ्वी गगन मेंबाहर भीतर एक। 
पूरणब्रह्म कबीर हैंअविगत पुरूष अलेख।।
गरीब
सेवक होय करि ऊतरेइस पृथ्वी के माँहि। 
जीव उधारन जगतगुरुबार बार बलि जांहि।।
गरीब
काशीपुरी कस्त कियाउतरे अधर अधार। 
मोमन कूं मुजरा हुवाजंगल में दीदार।।
गरीब
कोटि किरण शशि भान सुधिआसन अधर बिमान। 
परसत पूरणब्रह्म कूंशीतल पिंडरू प्राण।।
गरीब
गोद लिया मुख चूंबि करिहेम रूप झलकंत। 
जगर मगर काया करैदमकैं पदम अनंत।।
गरीब
काशी उमटी गुल भयामोमन का घर घेर। 
कोई कहै ब्रह्मा विष्णु हैंकोई कहै इन्द्र कुबेर।।
गरीब
कोई कहै छल ईश्वर नहींंकोई किंनर कहलाय। 
कोई कहै गण ईश काज्यूं ज्यूं मात रिसाय।।
गरीब
कोई कहै वरूण धर्मराय हैकोई कोई कहते ईश। 
सोलह कला सुभांन गतिकोई कहै जगदीश।।
गरीब
भक्ति मुक्ति ले ऊतरेमेटन तीनूं ताप। 
मोमन के डेरा लियाकहै कबीरा बाप।।
गरीब
दूध न पीवै न अन्न भखैनहींं पलने झूलंत। 
अधर अमान धियान मेंकमल कला फूलंत।।
गरीब
काशी में अचरज भयागई जगत की नींद। 
ऎसे दुल्हे ऊतरेज्यूं कन्या वर बींद।।
गरीब
खलक मुलक देखन गयाराजा प्रजा रीत। 
जंबूदीप जिहाँन मेंउतरे शब्द अतीत।।
गरीब
दुनी कहै योह देव हैदेव कहत हैं ईश। 
ईश कहै पारब्रह्म हैपूरण बीसवे बीस।।



Thursday, September 12, 2019

संत श्री चंद की कथा

संत श्री चंद की कथा 
यह एक महान कथा उस महान  संत की जिसका मतलब सीधा १३वे पंथ 
परदर्शक से हे , यह पंथ  गरीब दस जी के नाद से जुड़ा हुआ हे ,अनुरोध हे इसे थोड़ा धयान से पढ़े | 




महाराज श्रीचंद जो मोतीलाल जी के शिष्य और उत्तराधिकारी हुए थे वो जब 14 साल के थे तो बकरी चराते चराते काफी दूर निकल गए।
पहले रेवड़ (बकरियों का झुंड) को 100 किमी. तक चराने ले जाते और कई दिनों में घर वापिस आते तो महाराज श्रीचंद जी भी काफी दूर चले गए और अच्छी हरी भरी बणी देखी तो वहां डेरा लगा लिया।
 तो वहां उस बणी में मोतीलाल महाराज रहा करते थे।
श्रीचंद के पास कुछ चावल थे वह बकरियों का दूध निकालता और खीर बना लेता और कुछ खीर संत मोतीलाल को भी दे देता। काफी दिन मोतीलाल जी की संगत मिली और सत्संग सुना लेकिन मोतीलाल पर विश्वास नहीं था कि ये सच्चे संत है , पर ज्ञान अच्छा लगा।
एक दिन जब चांदनी रात थी गर्मियों का मौसम था , मोतीलाल जी मालिक की चर्चा कर रहे थे और श्रीचंद सुन रहे थे।
पास में रेवड़ बैठा था अचानक शिकारी कुतों ने एक बकरी के बच्चे को मार दिया।
श्रीचंद रोने लगा तब मोतीलाल जी ने कहा रो मत बेटा भगवान पर विश्वास रखो वो सब ठीक कर देगा। लेकिन श्रीचंद चुप नहीं हो सके , क्योंकि वो बकरियां गांव के थोलेदार की थी।
श्रीचंद तो उनका सिरी था।
श्रीचंद को डर था कि मेरे मालिक मुझे मारेंगे व कहेंगे कि तुमने रखवाली नहीं की।
तब मोतीलाल जी ने उस मृत बच्चे से कहा, "किसी को इतना नहीं रुलाते अब उठ भी जाओ।"
इतना कहते ही मृत बच्चा जिंदा हो गया। ये देख श्रीचंद को बड़ा आश्चर्य हुआ और मोतीलाल जी के चरण छुये और धन्यवाद किया। नामदीक्षा ली।
एक दिन जब मोतीलाल जी ईंट का तकिया लगाये लेटे हुए थे , रात का वखत था।
श्रीचंद बकरियों की रखवाली में बैठे थे और सुमिरन कर रहे थे।
आंखे कभी बंद कर लेते कभी खोल लेते , अचानक ध्यान लग गया और अंदर के नजारे करने लगे।
देखा कि मोतीलाल जी सिंहासन पर बैठे है और सभी देवी देवता उनके सामने हाथ जोड़े खड़े हैं।
ये देख श्रीचंद अचम्भे में था तो मोतीलाल ने पूछा कि क्या हुआ बेटा, तो ऐसा क्या देख रहे हो।
इतने में आंखे खुल गई तो सामने लेटे मोतीलाल ने कहा तुमने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया।
ये देख श्रीचंद पूरी तरह से फ़क़ीर हो गए और घर वापिस नहीं गए।
गांव के थोलेदार ने लंबे इंतजार के बाद दो आदमियों को भेजा कि श्रीचंद और बकरियों को ढूंढकर लाओ। कुछ दिनों में उन्होंने ढूंढ निकाला और श्रीचंद से कहा कि तुझे मालिक ने बुलाया है , चलो।
श्रीचंद ने कहा कि अब गुलामी मेरे गुरु मोतीलाल की करूँगा , तुम बकरियां ले जाओ , मैं नहीं जाऊंगा।
वो दोनों आदमी बकरियां लेकर वापिस लौट गए और थोलेदार से कहा कि श्रीचंद अब नहीं आएगा , वो वहीं रहेगा।
कोई मोतीलाल नाम के आदमी को अपना मालिक और गुरु कहता है , पागलों जैसी बातें करता है और कुछ बातें अपनी तरफ से बनाकर कह दी जिससे थोलेदार गुस्से से भर गया और कहा कि श्रीचंद मेरा सिरी (गुलाम) है , मैं देखता हूँ कैसे नहीं आएगा।
थोलेदार खुद श्रीचंद के पास जा पहुंचा और जबरदस्ती से श्रीचंद को गांव ले आया और घर का सारा काम करवाने लगा।
श्रीचंद कुछ समय बाद कहने लगा कि मुझे मेरे गुरु के दर्शन करा लाओ, लेकिन थोलेदार ने साफ मना कर दिया और हिदायत दी कि खबरदार जो गुरु का नाम भी लिया।
तो कुछ समय बाद श्रीचंद रात को चुपके से घर से भाग निकला और गुरु जी के पास जाने के लिए चल दिया।
जब सुबह पता चला कि श्रीचंद भाग गया तो फिर से ढूंढा और रास्ते से ही पकड़ लिया , गुरु तक नहीं पहुंचने दिया व लाकर एक कमरे में बंद कर दिया।
और जो अन्य सिरी थे उन्हें कहा कि तुम रेवड़ चराने जाओ।
श्रीचंद ये सब सुन रहा था और गुरु से प्रार्थना की कि मुझे अपने पास बुलालो, अब मैं आपके बैगेर नहीं रह सकता। इतने में गुरु के दर्शन हुए और कहा तुम बेफिक्र होकर निकल जाओ।
रात को अपने आप किवाड़ खुल गये और खुद मोतीलाल जी श्रीचंद का रूप बना के कमरे में बैठ गये और श्रीचंद उन गड़रियों के साथ चले गये।
जाकर मोतीलाल जी को प्रणाम किया और कहा बस अब तू ही तू और प्राण त्याग दिये।
गड़रियों ने उसका वहीं अंतिम संस्कार कर दिया और अस्थियां लेकर एक बन्दा गांव की तरफ रवाना हुआ।
उधर थोलेदार ने कमरा खोलकर श्रीचंद को बाहर निकाला और फिर से काम पर लगा दिया।
दो दिन बाद अस्थियां लेकर वो बन्दा गांव पहुंचा और थोलेदार से कहा कि साहब, श्रीचंद हमारे साथ गया था और वहां जाकर एक आदमी को प्रणाम किया और श्रीचंद चल बसा।
ये उनकी अस्थियां है।
इतने में वहां श्रीचंद आ गए। ये देख गड़रियों को आश्चर्य हुआ कि हमने खुद तेरा अंतिम संस्कार किया है और ये तुम्हारी अस्थियां है।
थोलेदार ने उन सभी को भी बुलाया जो बुलाया जो मौजूदा गवाह थे। उन्होंने भी कहा कि हां श्रीचंद मर चुका है , ये उन्ही की अस्थियां है।
तब थोलेदार ने वहां मौजूद श्रीचंद को कहा कि तुम जहां जाना चाहते हो जाओ , तो श्रीचंद ने कहा , "जब तक दो होते हैं तब एक दूसरे से मिलते है , अब कौन किससे मिलेगा।"
इस प्रकार श्रीचंद एक महान संत हुए और 25 वर्ष तक थोलेदार के घर काम किया और लोगों का भरम मिटाया कि देही बदलती है लेकिन गद्दी का मालिक एक ही होता है।

मोती माहिं सिरी है , सिरी है मोती माहिं।
सत ही गुरु गुरु ही सत दूजा जानो नाहिं।।


🌹सत साहेब जी🌹

Saturday, June 29, 2019

कबीरवाणी

कबीरवाणी






गुरु मिला तब जानिये, मिटे मोह तन ताप ।। | हरष शोक व्याप नहीं, तब गुरु आपै आप ।।।
सांई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। । मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ।।
एक ही साधै सब सधै, सब साधै सब जाय।। । माली सीचे मूल को, फूलै फलै अघाय !!
जो जाको गुन जानता, सो ताको गुन लेत।।
कोयल आमहि खात है, काग निंबोरी लेत।
कीया कछ न होते है, अनकीया ही होय।।
कीया जो कछू होत तो, करता औरे कोय ॥
आसा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास।
पानी में घर मीन का, सो क्यों मरै पियास ॥
गुरु कीजै जानि के, पानी पीजै छानि। - बिना विचारै गुरु करै, पड़े चौरासि खानि ॥

जैसी करनी जासु की, तैसी भुगतै सोय।। बिन सतगुरु की भक्ति के, जनम जनम दुख होय